समाज के मेहनतकश लोगों का मुद्दा उसी समाज के पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा और सुविधाभोगी वर्ग का भी मुद्दा होना चाहिए

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साथियों
जिस समाज के मेहनतकश लोगों का मुद्दा उसी समाज के पढ़े-लिखे, नौकरीपेशा और सुविधाभोगी वर्ग का मुद्दा नहीं बनता वह समाज तरक्की नहीं कर सकता। इसलिए समाज में सभी को सामंजस्य बनाकर चलना चाहिए। किसी पर समाज को पीछे ले जाने हेतु दोषारोपण करने के बजाय बेहतर होगा कि तरक्कीपसंद लोग अपनी आय का कुछ हिस्सा अपने समाज के आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग या शिक्षा से वंचित तबके के बच्चों की शिक्षा का खर्च वहन करने हेतु खर्च करें। जरूरी नहीं कि यह बड़ी राशि ही हो, यह राशि छोटी भी हो सकती है।
हम अपने ही समाज के किसी एक बच्चे की फीस, कॉपी-किताब का खर्चा तो उठा ही सकते हैं, जो कि बमुश्किल 500-800 प्रतिमाह तक हो सकता है।
भले ही यह राशि हमारे लिए छोटी ही हो लेकिन यह उन जरूरत मंदों के लिए बहुत उपयोगी हो सकती है। यही ‘पे बैक टू सोसाइटी’ का फंडा है।
जिस तरह का दौर चल रहा है इससे यह लगता है कि आगे आने वाले समय में हमें भी अपने अधिकारों और संसाधनों की रक्षा और सामाजिक बदलाव के लिए एक लंबी लड़ाई लड़ने हेतु तैयार रहना होगा। तब इस तरह की लड़ाई में लड़ने के लिए पढ़ा-लिखा, नौकरीपेशा और सुविधाभोगी वर्ग अपने हितों को बचाने के लिए शायद ही आगे आ पाएगा क्योंकि वह कई तरह के दबाव में रहता/आ जाता है। प्रायः देखा गया है कि ऐसी स्थिति में मेहनतकश तबका ही आगे आता है जो सबके हितों की या बदलाव की लड़ाई लड़ता है।
आजादी की लड़ाई में हमारे समाज के मेहनतकश लोगों ने भी यथाशक्ति सहयोग प्रदान किया था। अंग्रेजों के खिलाफ उन्होंने भी बिगुल फूंक दिया था, उन्होंने कई स्थानों पर अंग्रेजों या अंग्रेज समर्थकों के कपड़े धुलना या प्रेस करना बन्द कर दिया था, नाइयों और अन्य श्रमिक वर्गों ने भी साथ दिया था।
सम्पूर्ण आजादी की लड़ाई में भी हमारे समाज के बहुत से सुरमाओं ने अपने प्राणों की आहुति दी थी, जिनमें से कुछ के नाम प्रकाश में आए हैं परंतु अभी बहुतों के नाम प्रकाश में आने बाकी हैं। इस हेतु भी हमें शिद्दत से काम करना पड़ेगा। जिनके नाम हमारे सामने आ चुके हैं उनका इतिहास तैयार होना अभी भी बाकी है। इस कार्य में हमारे समाज के (नौकरियों से) सेवानिवृत्त लोग बखूबी योगदान दे सकते हैं, क्योंकि उनके पास समय भी है और धन भी।
अपने समाज के बच्चों को शिक्षा देने के साथ ही हमें अपने बच्चों को यह भी सिखाना पड़ेगा कि श्रमिकों के प्रति सम्मान हमारी भी जिम्मेदारी है, इसलिए हमारे बच्चों में श्रम करने वालों के प्रति सम्मान का भाव जगे जिससे आने वाली पीढियां श्रम करने वालों को सम्मान के भाव से देखें नफरत के भाव से नहीं। फिर चाहे अपने परम्परागत पेशे में लगे हुए लोग हों या अन्य पेशे वाले लोग।
हमारे समाज का जो तबका अपने परंपरागत पेशे में लगा हुआ है वह बड़े संकट के दौर से गुजर रहा है, वह जहां काम कर रहा है वही जगहें संकट में हैं, पूरब से लेकर पश्चिम तक, उत्तर से लेकर दक्षिण तक हर प्रदेश में उनके काम करने वाली जगहों पर सरकार, औद्योगिक घरानों और भू माफियाओं की नजरें लगी हुई हैं। ये लोग येन-केन प्रकारेण इन स्थानों पर कब्जा कर धोबियों को बेदखल करने की सारी कोशिशें कर रहे हैं। वे सब हमें बेदखल करने के लिए एक हो रहे हैं और हम आपस में ही घृणा और नफरत (धुलाई के धंधे में लगे लोगों को अपने से कमतर आंका जाता है और नौकरी पेशे वालों को उच्चतर आंका जाता है) के कारण एक नहीं हो पा रहे हैं या एक दूसरे के मुद्दों से इत्तेफाक नहीं रखते हैं।
हम शायद यह भूल जाते हैं कि सरकारें धीरे-धीरे एक-एक कर सबके कल्याण कार्यों और मिलने वाली सुविधाओं को खत्म कर रही हैं, ताजा उदाहरण के रूप में सरकारी नौकरी और फिर किसानों के मामले को देखा जा सकता है।
इसलिए समय रहते हमें अपने समाज के प्रति हीनताबोध के जकड़न, नैतिक जिम्मेदारी के स्खलन और चारित्रिक दोगलेपन से बाहर आकर चेतने और एकजुट होने की आवश्यकता है, जिससे हम अपने समाज के हितों की रक्षा कर सकें।
*नरेन्द्र दिवाकर*
मो. 9839675023

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