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कोरोना वायरस के दौर में लॉकडाउन के चलते खतरे में धोबी और उनका व्यवसाय

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लॉक डाउन के कारण लागभग पिछले 2 माह से दिहाड़ी मजदूरों के साथ साथ घरेलू कामगार और परंपरागत पेशा करने वाले लोगों के सामने भी अपने अपने परिवार का भरण-पोषण और रोजगार की दिक्कत आ गई है।
लॉक डाउन शुरू होने के बाद से ही परंपरागत पेशे में लगे धोबियों को दिक्कते पेश आनी शुरू हुईं। उनके सामने 2 जून की रोटी का संकट पैदा हो गया है क्योंकि आज भी धोबियों की एक बहुत बड़ी आबादी आज भी परंपरागत पेशे या उससे जुड़े विभिन्न कार्यों में लगी हुई है और इनके पास रोजगार का कोई अन्य स्रोत भी नहीं है। परिवार के सामने रोजी-रोटी का संकट होने के चलते उन्हें बच्चों की आगे की शिक्षा की भी चिंता सता रही है।
जिनके घरों में भी काम निकलता था अब सब बंद हो गया है क्योंकि पहला तो यह कि सब घर पर ही हैं, कार्यालय और बच्चे विद्यालय नहीं जाते इसलिए भी काम नहीं निकलता जो थोड़ा बहुत निकलता है घर पर ही कर लेते हैं और दूसरा यह कि ग्राहक लोग भी ऐसे समय में कोई जोखिम लेना नहीं चाहते इसलिए कपड़े नहीं दे रहे हैं। यदि कुछ काम मिलता भी है तो संक्रमण फैलने के डर से धोबी भी काम करने से पीछे हट जाते हैं। ऐसी हालत किसी एक जिले य्या प्रदेश विशेष की न होकर पूरे देश भर की है।
इसी दौर में कुछ राज्यों की सरकारों ने कुछ राहत प्रदान करने की कोशिश की है जो काबिले गौर जरूर है लेकिन नाकाफ़ी है। धोबियों की मांग पर दिल्ली सरकार ने कंटेन्मेंट जोन को छोड़कर शेष दिल्ली में एहतियात बरतते हुए काम करने की इजाजत दे दी है।
झारखंड सरकार ने अप्रैल माह के अंतिम सप्ताह में धोबियों को आर्थिक सहायता देने हेतु योजना तैयार की थी जिसके तहत विशेष तरह की सुविधाएं प्रदान करने की बात की जा रही थी।
कर्नाटक सरकार ने 1610 करोड़ के राहत पैकेज की घोषणा की जिसके तहत धोबियों को 5-5 हजार रुपए एकमुश्त मुआवजे के तौर पर दिए जाएंगे। अनुमान के मुताबिक कर्नाटक में 60 हजार धोबी सेवा प्रदाता के तौर पर अपनी सेवाएं प्रदान कर रहे हैं। साथ ही बिजली उपभोक्ता के तौर पर भी कुछ राहत मिलेगी। 5 हजार रुपए की राशि अधिक नहीं है पर आर्थिक तंगी में राहत जरूर प्रदान करेगी।
दुसरी तरफ बड़ी-बड़ी लांड्री कंपनियां गुड़गांव जैसे शहर में सेफ्टी इक्विपमेंट की सहायता से काम कर रही हैं। उन्हें सरकारी काम भी मिल रहे हैं, हां यह जरूर है कि ये कंपनियां स्टॉफ की कमी के चलते अभी घरेलू ग्राहकों के काम नहीं ले रही हैं, जिसके भी 10 मई तक शुरू हो जाने की सम्भवना है।
परंपरागत धुलाई का काम करने वालों के सामने यह भी संकट है कि उनके ग्राहक लंबे समय तक सेवा न मिलने के कारण उनसे छूट जाएंगे।
जहां एक तरफ राज्य सरकारें अपने स्तर से कुछ राहत देने का प्रयास कर रही हैं वहीं कुछ सामुदायिक संगठनों (हैदराबाद/तेलंगाना रजक संघ, राष्ट्रीय रजक महासंघ आदि जैसे अखिल भारतीय स्तर के संगठनों) ने भी राज्य सरकारों और केंद्र सरकार से इस पेशे में लगे लोगों को लॉक डाउन रहने तक मुफ्त राशन देने, दुकानों का किराया, बिजली का बिल माफ करने और आर्थिक सहायता देने की मांग की है।
यदि गिने-चुने राज्यों को छोड़ दें तो धोबियों के लिए अभी तक कोई मुकम्मल इंतजाम नहीं किया है।
जिन ग्राहकों के पास धुलाई के पैसे पड़े भी हैं वह नहीं दे रहे हैं तो ये लोग भी ग्राहक से बकाया की मांग नहीं कर रहे हैं क्योंकि ऐसे समय में मांगना अच्छा नहीं लगता। कुछ लोगों ने दूसरे कामों में हाथ आजमाना चाहा तो लेकिन वे सफल नहीं हो सके।
जो लोग अपने परिवार के साथ दिल्ली, मुंम्बई, कलकत्ता जैसे शहरों में परिवार के साथ रह रहे हैं उनकी दशा और खराब है क्योंकि ऐसे समय न पैसे बचे हैं न राशन, करें तो करें क्या?
कुछ लोग तो अपनी जान जोखिम में डालकर पैदल, साइकिल, ट्रक या अन्य साधनों की सहायता से अपना डेरा कूंच कर चुके हैं। कुछ अभी ट्रेन चलने का इंतजार कर रहे हैं। मुम्बईइन प्रवासी धोबियों की संख्या अन्य किसी शहर की अपेक्षा अधिक है इसलिए सबसे ज्यादा लोग वहीं परेशान हैं।
समस्या इतनी गंभीर है कि लोग लॉक डाउन के कारण बाद में अपने बच्चों का एडमीशन और फीस जमा कर पाने में असमर्थ होंगे।
जो बच्चे पढ़ भी रहे हैं उनके घर में एंड्रॉइड फोन न होने के कारण अपने उन सहपाठियों से पिछड़ रहे हैं जिनके पास ऐसी सुविधाएं उपलब्ध हैं।
लॉक डाउन के कारण मेहनतकश वर्ग के बच्चों के ड्राप आउट रेट भी बढ़ने की संभावना है। ऐसे में जो लोग परम्परागत व्यवसाय से इतर कार्य करते थे वे भी वही जाति आधारित व्यवसाय करने को बाध्य होंगे। इसके अतिरिक्त पूंजी और स्किल दोनों का आभाव होगा जिसके चलते वे वैकल्पिक व्यवसाय भी नहीं अपना सकते।
इस भयावह संकट के दौर में प्रौद्योगिकी आधरित धुलाई और प्रेस के साथ-साथ अन्य रोजगारपरक कार्यों को विकल्प के रूप में अपनाना होगा तभी जा कर संकट से राहत मिलेगी और गांव से पलायन रुक सकेगा।
केंद्र और राज्य दोनों सरकारों को परम्परागत पेशे में लगे हुए लोगों के लिए भी आर्थिक और रहत पैकेज प्रदान करना चाहिए जिसे इनके हितों की भी रक्षा हो सके। विभिन सामुदायिक संगठनों को भी चाहिए कि मूक दर्शक की भूमिका से बाहर आकर सरकार से प्रभावी कदम उठाने की मांग करें सामुदायिक व सांगठनिक स्तर पर धोबियों की सहायता हेतु प्रयास करें जिससे धुलाई के परंपरागत पेशे में लगे लोगों को भोजन के अभाव में जीवन न जीना पड़े।
संक्रमण की दृष्टि से धुलाई का काम बहुत संवेदनशील है इसलिए धोबियों को धुलाई का कार्य करने से विरत रहकर जान की कीमत पर धंधा नहीं करना चाहिए फिर भी यदि जिन्हें धुलाई और धुलाई संबंधी कार्य करना भी पड़ रहा है तो उन्हें स्वयं Physical Distencing (शारीरिक दूरी) बनाए रखना चाहिए। कोरोना संक्रमण से उनकी रक्षा करने के लिए सरकार को सैनिटाइजर, मास्क और आवश्यक संसाधन उपलब्ध कराना चाहिए।
साथ ही कर्नाटक सरकार की तरह देश के साभ्य राज्यों में राहत पैकेज दिए जाने चाहिए।
*नरेन्द्र दिवाकर*
मो. 9839675023

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