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अगर जिंदा रहना है तो हमें अपनी परंपराओं को बचना ही होगा

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साथियों!

अगर, हम आज़ादी के बाद अपनी खुद की जरुरत के अनुसार शिक्षा व्यवस्था का विकास करते, जो हमारी जातिगत बुराइयों और रुढियों को तोड़कर, परम्परागत कौशल को एक मज़बूत शैक्षणिक और आर्थिक आधार दे समय के अनुसार निखारता- तो आज हम भी दुनिया में बहुत आगे होते। लेकिनहमने आजादी के बाद अंग्रेजों के उन्हीं मापदंडों को अपनाया, जो बेमेल किताबी ज्ञान को ही सर्वश्रेष्ठ बताता था व श्रम और कला का शोषण करने वाला था। गांधी जानते थे कि हमारे देश में विभिन्न समुदायों के पास अटूट परम्परागत ज्ञान और समझ है। हम अपनी रोज़मर्रा की जिन्दगी में ऐसे अनेक लोगों से मिलते है- जो लिखित ज्ञान भले ही न रखते हों, लेकिन कला और कौशल के मामले में बहुत धनी होते हैं। भले ही कोई इंजीनियरिंग की पढ़ाई पढ़ ले परंतु भवन निर्माण की जो समझ मिस्त्रियों के पास होती है वह शायद ही पढ़ाई से प्राप्त हो। मिस्त्री शब्द ज्ञान में भले ही अनपढ़ हो पर उसे भी ज्यामिति की पूरी समझ होती है तभी तो इंजीनियर के बनाए नक्शे के हिसाब से अनपढ़ मिस्त्री और श्रमिक बड़ी-से बड़ी इमारत खड़ी करने में माहिर होते हैं। इसी अनुभव और व्यावहारिक समझ से निकलती हैं तमाम तरह की कलाएं। हर जातियों की अपनी अलग-अलग कलाएं होती हैं। जो भी चीजें या कलाएं लोक से निकली हैं उनमें संबंधित जातियों की न केवल पूरी जीवनचर्या या जीवन शैली समाहित होती है अपितु वह जीवन का अभिन्न अंग होती हैं। पुराने समय में गांव के लोग अपनी भावनाओं को दर्शाने के लिए जो नृत्य करते थे उन्हें लोक नृत्य कहा जाता है। इसी तरह का एक नृत्य है “धोबिया नृत्य”
धोबिया नृत्य पूर्वांचल के कई जिलों में प्रचलित है जो धोबी समुदाय द्वारा किया जाता है। इसके माध्यम से धोबी एवं गदहे के मध्य आजीविका संबंधों का भावप्रवण निरूपण किया जाता है। इसके अंतर्गत धोबी जाति द्वारा मृदंग, झांझ, डेढ़ताल, घुंघरू, घंटी बजाकर नाचा जाता है। यह नृत्य जिस उत्सव में नहीं होताथा,उस उत्सव को अधूरा माना जाता था। पांव में घुंघरू, कमर में फेंटा, हाथों में करताल के साथ कलाकारों के बीच काठ का सजा घोड़ा ठुमुक-ठुमुक नाचने लगता है तो गायक-नर्तक भी उसी के साथ झूम उठते हैं। टेरी, गीत, चुटकुले के रंग, साज के संग यह एक अनोखा नृत्य है।
धोबिया नृत्य भले हीधोबी जाति के लोगों का नृत्य हो परंतु दूसरी जातियों के कुछ लोग इस नृत्य कला को अपनाकर इसके जातीय मिथक को तोड़ रहे हैं। कमर में घुंघरू और शरीर पर रंग बिरंगे वस्त्र पहन कर जब बांसुरी बजा कर ढोलक की थाप पर नाचना शुरू करते हैं तो समां बंध जाता है और दर्शकों की भीड़ थम जाती है। दूसरी जाति के लोग इस नृत्य के बदौलत अपनी पहचान कायम कर रहे हैं और हमारी जाति के लोगों को अपनी ही कला या संस्कृति को बचाए रखने में अब शर्म महसूस होने लगी है। ऐसा नहीं है कि इसे केवल निम्न जाति के लोग ही करते हैं बल्कि इस नृत्य को करने वालों में मुसलमान और ब्राहमण जाति के लोग भी शामिल हैं। उनसे जब यह पूंछा जाता है कि इससे उन्हें कितनी कमाई हो जाती है तो वे बड़ी बेबाकी से कहते हैं कि हम लोग कमाई के लिए ये नहीं करते, हमारा मकसद केवल इस कला को बचाए रखना है और इसीलिए हम यह नृत्य करते हैं। आश्चर्य होता है कि हम अपने आपको धोबी जाति का होने के कारण इतना हीन समझने लगे हैं कि अब हमारी कला या संस्कृति को बचाने के लिए दूसरी जातियों के लोग आगे आ रहे हैं पर हमपढ़ने- लिखने के बावजूद भी अपनी इस कला के प्रति उदासीन बने हुए हैं। किसी भी समाज को सबसे ज्यादा उम्मीद अपने समाज के पढ़े-लिखे लोगों से ही होती है पर जब समाज का वही पढ़ा-लिखा तबका अपनी ही कलाओं और संस्कृति के प्रति उदासीन बन जाए तो फिर किससे उम्मीद की जा सकती है? यह कहने में कोई संकोच नहीं होता कि हमसे भले हमारे पूर्वज थे, जो पढ़े-लिखे तो जरूर नहीं थे पर जातिगत भेदभाव, उत्पीड़न और अत्याचार सहने के बावजूद भी न तो कभी अपनी जाति को हीन समझा और न ही इसके लिए कभी अपने पुरखों को कोसा या जिम्मेदार ठहराया। बदले में हमें अपनी समृद्ध विरासत सौंपी पर हम आज-पढ़ लिखकर भी उस समृद्ध विरासत को सहेज पाने में अक्षम साबित हो रहे हैं। जब हमे आरक्षण लेना होता है तब हम अपनी जाति को न तो कोसते हैं और न ही उसे अपने पिछड़ेपन का जिम्मेदार ठहराते हैं परंतु जैसे ही हम आरक्षण प्राप्तकर सफल हो जाते हैं तब समाज में केवल अपना स्टेटस उपर उठाने के लिए अपनी जाति छुपाते हैं और अपनी उसी जाति को कोसने और जिम्मेदार ठहराने लगते हैं जिसकी वजह से हम उस पद या वर्तमान स्थिति पर पहुँचे हैं। हम यह भूल जाते हैं कि हमारी भी एक गौरवशाली परंपरा रही है और हमारा इतिहास बहुत ही क्रांतिकारी रहा है। हम यह भी भूल जाते हैं कि किसी जाति की कला का ख़त्म हो जाने का तात्पर्य उस जाति के गौरवशाली इतिहास का ख़त्म हो जाना भी है और उस जाति के बचे हुए लोगों का मर जाना (जो कि मर जाने के समान ही है) भी। हमें यह सोंचना होगा कि हमारे पुरखों ने तो हमें एक समृद्ध विरासत सौंपी थी पर हम अपनी आने वाली पीढ़ी को ऐसा क्या दे जाएँगे जिसे यादकर वे लंबे समय तक गौरवान्वित हो सकें? हम क्या जवाब देंगे अपनी आने वाली पीढ़ी को कि हमें हमारे पूर्वजों ने जो कुछ भी दिया उसका अंश मात्र भी हम आपको देने में नाकामयाब रहे हैं? कोई भी लोक कला यूं ही नहीं बन जाती उसके बनने में पीढ़ियाँ क़ुरबान हो/गुजर जाती हैं उनके वर्तमान स्थिति में आने में इतना लंबा समय लगा होगा, इतनी कठिनाइयाँ साहनी पड़ी होंगी जिसकी हम कल्पना तक नहीं कर सकते। पढ़े-लिखे होने के नाते हमारा यह उत्तरदायित्व तो बनता ही है कि अगर हम अपने पूर्वजों की समृद्ध विरासत में अगर कुछ जोड़ न पाएं तो कम से कम इतना तो अवश्य कर सकते हैं कि इनको संरक्षित करने का हर संभव उपाय करें, क्योंकि पढ़े-लिखे लोगों की उपेक्षा के कारण ही कभी हमारे समाज के गौरवशाली अतीत का हिस्सा रहा ‘धोबिया नृत्य’आज संक्रमण के दौर से गुजर रहा है।

नरेन्द्र दिवाकर

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