*आगे बढ़ने के लिए जरूरी है सहयोगात्मक दक्षता*

*आगे बढ़ने के लिए जरूरी है सहयोगात्मक दक्षता*

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हमें आगे बढ़ने के लिए विभिन्न प्रकार की दक्षताओं की जरूरत है लेकिन ध्यान यह रहे कि विभिन्न प्रकार की दक्षताएं तब तक कोई खास मायने नहीं रखतीं, जब तक कि उसमें बहुत से दूसरे लोगों के साथ आपसी सहयोग करने की दक्षता का योग नहीं होता। इसलिए हमें बड़ी तादाद में अपने समुदाय के अजनबियों के साथ सहयोग करने की हमारी क्षमता में असाधारण ढंग से वृद्धि करनी होगी। जिस दिन ऐसा होगा हमें एक संगठित समुदाय बनने से कोई रोक नहीं सकता क्योंकि तब हम सभी अजनबियों का एक ही लक्ष्य होगा ‘हमारे अपने समुदाय को सशक्त बनाकर दूसरों की आवश्यकताओं में मदद करना’। इसे इस तरह से समझा जा सकता है जैसे- परमाणु बम को तैयार करने में दुनिया भर के लाखों अजनबियों का आपसी सहयोग जरूरी होता है। जिन्हें अब भी न समझ आए उन्हें सिंधु बॉर्डर सहित विभिन्न स्थानों पर कृषि कानूनों के विरोध में एकत्र लाखों अजनबी किसानों के आंदोलन से समझना चाहिए। जहां लाखों अजनबी महिलाएं, पुरुष और वृद्ध सभी जमा होकर एकजुटता प्रदर्शित कर रहे हैं।

युवाल नोआ हरारी कहते हैं कि- वर्तमान दौर का पर्यावरण हमें पहले से कहीं अधिक भौतिक संसाधन और लंबा जीवन मुहैय्या कराता है लेकिन यह हमेशा हमारे भीतर अवसादग्रस्त, तनावग्रस्त और अलगावग्रस्त होने का भी अहसास जगाता है। इसलिए यदि हमें इन समस्याओं से बचना है तो हमें आपसी सहयोग करना ही होगा।
ध्यान यह भी रखना होगा कि भले ही हमारे (चंद लोगों के) पास नौकरी है, पैसा है, गगनचुंबी इमारतों/अपार्टमेंट्स में फ्लैट(स) हों, हमारे बच्चे होटल से चमचमाते महंगे स्कूलों में पढ़ते हैं परंतु हमारे समुदाय के अधिकांश लोग आज भी भर पेट भोजन, तन ढकने के लिए जरूरी अदद कपड़े और बच्चों की अच्छी शिक्षा के लिए जद्दोजहद करने में अपनी पूरी जिंदगी खपाए रहते हैं।
जिस समुदाय में आपसी सहयोग और सामुदायिक एकजुटता की भावना विकसित हुई आज उनके सदस्यों में विभिन्न प्रकार की दक्षताओं को देखा जा सकता है।
हमारे समुदाय में जब कोई बदलाव लाने की शुरुआत करता है या काम करता है तो लोग उसके काम को अच्छा कहते हुए कहते हैं कि- आपको यह करना चाहिए, वह करना चाहिए, वहां जा कर बदलाव लाने के लिए काम करना चाहिए, यहां इसकी कोई जरूरत नहीं… keep it up, आप या आप लोग बहुत अच्छा कर रहे हैं, लगे रहिए…आदि-आदि। लेकिन ऐसा कहने वाले यह नहीं सोंचते कि वे लोग कुछ अच्छा कर रहे हैं तो हम भी कीड़े-मकोड़े वाली (सिर्फ अपना व परिवार का भरण-पोषण करने वाली) जिंदगी से बाहर निकलकर समुदाय की बेहतरी के लिए कुछ तो करें या फिर ऐसा करने वालों का सहयोग करें!
वे कुछ नहीं कर पाते (करते) तो ऐसा इसलिए है क्योंकि उन लोगों के लिए उन्हीं के समुदाय के बाकी लोग अजनबी हैं और वे न तो अजनबियों का सहयोग करना चाहते हैं न ही इससे सम्बंधित अपनी दक्षता विकसित करना चाहते हैं।
इसलिए हम सभी को समुदाय की बेहतरी के लिए समुदाय के बाकी अजनबियों के सहयोग से कुछ न कुछ अवश्य करना होगा तभी हम परमाणु बम जैसी ताकत वाला समुदाय बन/बना पाएंगें।

*नरेन्द्र दिवाकर*
मो. 9839675023
सुधवर, चायल, कौशाम्बी(उ. प्र.)

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